अंदर कदम रखते ही बदल जाती है दुनिया, यहीं बन रहे हैं भारत के प्राइवेट रॉकेट

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दरवाज़े के अंदर कदम रखते ही ठंडी एयर कंडीशनिंग की तेज़ हवा महसूस होती है। फर्श पूरी तरह चमकदार हैं और चारों ओर ऑफ-व्हाइट रंग का सुकूनभरा माहौल है। बैठने की जगहें किसी साइंस-फिक्शन फिल्म के स्पेसशिप जैसी लगती हैं। कांच के केबिनों पर मंगल, शुक्र और ओरियन जैसे नाम लिखे हैं। हर चीज़ में गंभीरता और सटीकता झलकती है।

जैसे ही इलेक्ट्रॉनिक लॉक वाले दरवाज़े खुलते हैं, माहौल पूरी तरह बदल जाता है। ऑटोमैटिक लिफ्ट की सायरन गूंज उठती है। कहीं इलेक्ट्रॉनिक्स की लगातार भनभनाहट है, तो कहीं केबल और फाइबर-ऑप्टिक तारों का जाल बिछा है। कुछ ही दूरी पर कार्बन मटीरियल को आकार दिया जा रहा है। एक वैक्यूम चैंबर, जो आकार में एक बेडरूम जितना बड़ा है, हाई-टेम्परेचर बेकिंग के लिए तैयार खड़ा है। यह दफ्तर नहीं, बल्कि एक हाई-टेक फैक्ट्री फ्लोर है।

जहां भारत के स्पेस भविष्य की नींव रखी जा रही है

65,000 वर्ग फुट के इस विशाल वर्कशॉप के आखिर में तिरंगा — केसरिया, सफेद और हरा — एक नए युग की शुरुआत का साक्षी बनता है। यह है भारत की पहली प्राइवेट रॉकेट फैक्ट्री, जिसे हैदराबाद में स्काईरूट एयरोस्पेस ने बनाया है। इस फैक्ट्री का नाम Max-Q है, जो रॉकेट के उस सबसे चुनौतीपूर्ण पल का प्रतीक है, जब उसे अंतरिक्ष में प्रवेश से पहले अधिकतम एयरोडायनामिक दबाव झेलना होता है।

भारत में प्राइवेट स्पेस सेक्टर का बदलता चेहरा

स्काईरूट का छोटा-सा मुख्यालय अब बदलकर Infinity Campus बन चुका है। यह 2 लाख वर्ग फुट का अत्याधुनिक परिसर है, जहां करीब 1,000 कर्मचारी तीन शिफ्टों में, दिन-रात काम कर रहे हैं। लक्ष्य बेहद साफ है — हर महीने एक रॉकेट तैयार करना, जिसे मांग आने के सिर्फ 72 घंटे के भीतर लॉन्च के लिए तैयार किया जा सके।

एक आइडिया से रॉकेट तक का सफर

इस कहानी की शुरुआत होती है दो IIT ग्रेजुएट्स — भारथ डाका और पवन चंदाना — से, जिनकी मुलाकात इसरो में हुई थी। दोनों को उस समय एक नए रॉकेट प्रोजेक्ट पर काम करने की जिम्मेदारी मिली थी, जो आगे चलकर भारत का सबसे ताकतवर रॉकेट बना — LVM Mk-III। यही हैवी-लिफ्ट रॉकेट था जिसने चंद्रयान-3 को अंतरिक्ष तक पहुंचाया।

जब LVM Mk-III ने सफल उड़ान भरी, तो एक बड़ा सवाल सामने आया। अगर भारत भारी रॉकेट बना सकता है, तो क्या वह छोटे सैटेलाइट लॉन्च करने में भी दुनिया में अपनी अलग पहचान बना सकता है? क्या 500 किलोग्राम तक का पेलोड कक्षा में पहुंचाने वाला एक खास रॉकेट डिजाइन किया जा सकता है?

भारथ कहते हैं, “इस प्रोजेक्ट ने हमें रॉकेट बनाने की पूरी प्रक्रिया को बहुत करीब से समझने का मौका दिया। हम प्राइवेट स्पेस सेक्टर में हो रहे बदलावों पर भी नजर रख रहे थे। 2017 में न्यूज़ीलैंड की Rocket Lab की पहली लॉन्चिंग हमारे लिए बड़ी प्रेरणा थी। भारत के पास मजबूत टेक्नोलॉजी और मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम है। तभी हमने 2018 में इसरो छोड़कर स्काईरूट शुरू करने का फैसला लिया।”

अब नजर छोटे सैटेलाइट बाजार पर

सात साल बाद स्काईरूट को बड़े निवेशकों का मजबूत समर्थन मिल चुका है और कंपनी का वैल्यूएशन 4,000 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है। कंपनी का मकसद साफ है — भारत को छोटे सैटेलाइट लॉन्च करने का ग्लोबल हब बनाना।

इसी दिशा में अगला कदम है Vikram-I, कंपनी का पहला लॉन्च व्हीकल, जिसे भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया है।

नया Infinity Campus इस वक्त फुल स्पीड पर काम कर रहा है। चार-स्टेज वाले Vikram-I रॉकेट के अलग-अलग हिस्सों पर एक साथ काम चल रहा है। भारथ बताते हैं, “अभी हम तीन Vikram-I रॉकेट पर काम कर रहे हैं। इनमें इस्तेमाल हो रही टेक्नोलॉजी और मशीनें पूरी तरह आधुनिक हैं। हमारा फोकस स्वदेशी निर्माण पर है, जिसमें कई इनोवेशन हमने खुद विकसित किए हैं।”

भारत में तेजी से बढ़ते प्राइवेट स्पेस सेक्टर के बीच यह फैक्ट्री एक अहम पड़ाव मानी जा रही है। भारत के स्पेस सेक्टर में अब सिर्फ सरकारी मिशन नहीं, बल्कि प्राइवेट कंपनियां भी नई उड़ान भरने को तैयार हैं — और स्काईरूट की यह फैक्ट्री उसी बदलाव की सबसे ठोस झलक है।

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Monar​​ch Surveyors को रेलवे से मिला ₹51.19 करोड़ का बड़ा प्रोजेक्ट, 36 महीने में पूरा करना होगा काम

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Monarch Surveyors and Engineering Consultants Limited ने रेलवे सेक्टर से जुड़ा एक बड़ा कॉन्ट्रैक्ट हासिल किया है। कंपनी ने 16 अक्टूबर 2026 को स्टॉक एक्सचेंज को दी गई जानकारी में बताया कि उसे दक्षिण रेलवे (Southern Railway) से ₹51.19 करोड़ का प्रोजेक्ट मिला है। इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत कंपनी को रेलवे के नए ब्रॉड गेज, डबलिंग और मल्टी-ट्रैकिंग प्रोजेक्ट्स के लिए सर्वे से जुड़ा काम करना होगा।

दक्षिण रेलवे से मिला ₹51.19 करोड़ का Contract

कंपनी के अनुसार, उसे दक्षिण रेलवे के अंतर्गत विभिन्न रेलवे परियोजनाओं के लिए ट्रैफिक सर्वे, फाइनल लोकेशन सर्वे और Detailed Project Report (DPR) जमा करने का काम सौंपा गया है। यह कार्य चेन्नई के एग्मोर स्थित दक्षिण रेलवे के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी (निर्माण) के अधिकार क्षेत्र में किया जाएगा।

इस प्रोजेक्ट का Total contract value ₹51,19,56,000.29 बताया गया है। कंपनी को लेटर ऑफ एक्सेप्टेंस (Letter of Acceptance) जारी होने की तारीख से 36 महीने के भीतर पूरा काम करना होगा।

Monarch Surveyors

प्रोजेक्ट से जुड़ी अहम जानकारी

ParticularsDetails
CompanyMonarch Surveyors and Engineering Consultants Limited
Order Awarding AuthoritySouthern Railway
Contract Value₹51,19,56,000.29
Contract Duration36 Months
Project TypeDomestic
Scope of WorkTraffic Survey, Final Location Survey, and Submission of DPR
Project ObjectiveSurvey work for new broad-gauge lines, railway line doubling, and multi-tracking projects
Project LocationEgmore, Chennai, Tamil Nadu
Payment MethodCash Consideration

सरकारी मंजूरी के अधीन रहेगा काम

कंपनी की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, इस प्रोजेक्ट के लिए संबंधित सरकारी अधिकारियों से आवश्यक मंजूरियां लेनी होंगी। यह कॉन्ट्रैक्ट घरेलू संस्था से मिला है। कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस लेनदेन में प्रमोटर ग्रुप का कोई हित नहीं है और यह रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शन की श्रेणी में नहीं आता।

स्टॉक एक्सचेंज को दी गई जानकारी

Monarch Surveyors and Engineering Consultants Limited ने यह खुलासा SEBI के लिस्टिंग ऑब्लिगेशन एंड डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट्स (LODR) रेगुलेशन, 2015 के रेगुलेशन 30 के तहत किया है। कंपनी ने संबंधित विवरण स्टॉक एक्सचेंज के साथ साझा किए हैं।

निष्कर्ष

Monarch Surveyors and Engineering Consultants Limited को दक्षिण रेलवे से मिला ₹51.19 करोड़ का यह कॉन्ट्रैक्ट सर्वे और रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं से जुड़ा है। कंपनी को लेटर ऑफ एक्सेप्टेंस जारी होने के बाद 36 महीने के भीतर निर्धारित कार्य पूरा करना होगा।

Source :- https://www.bseindia.com/xml-data/corpfiling/AttachLive/950e90a4-1cfe-4258-a0ed-4a700a21dfdc.pdf
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