अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Trump) ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक बार फिर बड़ा और व्यापक फैसला लिया है। एक नए कार्यकारी आदेश के तहत अमेरिका ने कुल 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से खुद को अलग कर लिया है। इनमें 31 संयुक्त राष्ट्र से जुड़े संस्थान भी शामिल हैं। इस सूची में भारत मुख्यालय वाला इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) भी है, जो अमेरिका द्वारा छोड़ा गया इकलौता भारत-आधारित अंतरराष्ट्रीय संगठन बन गया है।
मार्को रुबियो ने ट्वीट कर दी जानकारी (Marco Rubio shared the information on Twitter)
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Marco Rubio) ने इस फैसले की सार्वजनिक पुष्टि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर की। उन्होंने लिखा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका को 66 ऐसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकालने का ऐलान किया है, जिन्हें “एंटी-अमेरिकन, बेकार या संसाधनों की बर्बादी” बताया गया है।
रुबियो के मुताबिक, यह कदम अमेरिकी नागरिकों से किए गए उस वादे का हिस्सा है, जिसके तहत अमेरिका उन संस्थाओं को फंड देना बंद करेगा जो उसके हितों के खिलाफ काम करती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बाकी अंतरराष्ट्रीय संगठनों की समीक्षा प्रक्रिया अभी जारी है।
क्या है ट्रंप का बड़ा फैसला? (What is Trump’s latest order?)
बुधवार, 7 जनवरी को जारी इस आदेश के जरिए अमेरिका ने औपचारिक रूप से कई वैश्विक संस्थाओं से खुद को अलग करने की प्रक्रिया शुरू की। यह फैसला ट्रंप ( trump ) के दूसरे राष्ट्रपति कार्यकाल में जनवरी 2025 से शुरू हुई उस नीति का विस्तार है, जिसमें उन्होंने विदेश मंत्री को निर्देश दिया था कि अमेरिका जिन अंतरसरकारी संगठनों का सदस्य है या जिन्हें फंड देता है, उनकी गहन समीक्षा की जाए। इस समीक्षा का मकसद ऐसे संगठनों की पहचान करना था, जो ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति के अनुसार अमेरिका के हितों के अनुकूल नहीं हैं।
किन बड़े संगठनों से अमेरिका बाहर हुआ?
इस फैसले की जद में जलवायु और पर्यावरण से जुड़े कई अहम वैश्विक मंच आए हैं। इनमें इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) और इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) जैसे नाम शामिल हैं। इन्हीं के साथ भारत मुख्यालय वाला इंटरनेशनल सोलर अलायंस भी अब अमेरिका की सदस्यता से बाहर हो गया है।
इंटरनेशनल सोलर अलायंस क्या है? ( What is the International Solar Alliance?)
ISA की अवधारणा इस सोच पर आधारित है कि कर्क रेखा और मकर रेखा के बीच स्थित 120 से ज्यादा देश सौर ऊर्जा का उपयोग कर अपनी बिजली जरूरतें पूरी कर सकते हैं। यह भारत और फ्रांस की संयुक्त पहल है, जिसका उद्देश्य सोलर एनर्जी के जरिए जलवायु परिवर्तन से निपटना है।
इसका मुख्यालय हरियाणा के गुरुग्राम में स्थित है। संगठन की प्रमुख रणनीति ‘टुवर्ड्स 1000’ है, जिसके तहत 2030 तक:
सोलर एनर्जी में 1,000 अरब डॉलर का निवेश
1,000 मिलियन लोगों तक स्वच्छ ऊर्जा की पहुंच
1,000 गीगावॉट सौर क्षमता स्थापित करने का लक्ष्य है।
ISA की शुरुआत कब हुई थी ?
ISA की परिकल्पना 2015 में पेरिस में हुए COP21 सम्मेलन के दौरान की गई थी, जब ऐतिहासिक पेरिस जलवायु समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। शुरुआत में यह केवल उष्णकटिबंधीय देशों तक सीमित था, लेकिन 2020 में संशोधन के बाद सभी संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों के लिए इसकी सदस्यता खोल दी गई।
वर्तमान में 100 से अधिक देश इसके हस्ताक्षरकर्ता हैं और 90 से ज्यादा देश पूर्ण सदस्य बन चुके हैं।

प्रगति पर क्यों उठे सवाल?
2024 की रिपोर्ट बताती है कि इंटरनेशनल सोलर अलायंस की कई योजनाओं की प्रगति उम्मीद से धीमी रही। अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों में शुरुआती तैयारियां तो पूरी हो चुकी हैं, लेकिन परियोजनाएं अभी तक शुरू नहीं पाई हैं। यह तस्वीर ऐसे दौर में उभरी है, जब 2019 से 2024 के बीच वैश्विक स्तर पर सोलर ऊर्जा क्षमता में हर साल 20 फीसदी से ज्यादा की तेज़ बढ़ोतरी दर्ज की गई, हालांकि इस विस्तार का सबसे बड़ा हिस्सा चीन के पास रहा।
ट्रंप (Trump) की सोलर एनर्जी पर आपत्ति
डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से रिन्यूएबल एनर्जी के आलोचक रहे हैं। वे थर्मल पावर को अमेरिकी नौकरियों से जोड़ते रहे हैं। 2025 में उन्होंने जलवायु परिवर्तन को “सबसे बड़ा धोखा” बता दिया था, जबकि वैज्ञानिक समुदाय मानव गतिविधियों से बढ़ते ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर व्यापक सहमति जता चुका है।
पहले कार्यकाल की रूपरेखा
यह रुख ट्रंप के पहले कार्यकाल (2017–21) से मेल खाता है। फोर्ब्स की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में अमेरिकी बिजली क्षेत्र में 43% नौकरियां सोलर एनर्जी से जुड़ी थीं, जबकि पूरे फॉसिल फ्यूल उद्योग की हिस्सेदारी 22% थी। विदेशी सोलर पैनलों पर लगाए गए टैरिफ के बाद 2017 में 10,000 और 2018 में 8,000 सोलर नौकरियां खत्म हो गईं।
अभी की स्थिति
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी 2025 में ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने के बाद से संघीय जमीन पर केवल एक सोलर प्रोजेक्ट को मंजूरी मिली है। जुलाई 2024 के बाद से कोई नया प्रोजेक्ट पास नहीं हुआ, क्योंकि गृह मंत्री डग बर्गम ने सभी रिन्यूएबल एनर्जी परियोजनाओं के फैसलों को अपनी व्यक्तिगत मंजूरी से जोड़ दिया है।
निष्कर्ष
इंटरनेशनल सोलर अलायंस से अमेरिका का बाहर होना केवल एक औपचारिक सरकारी निर्णय भर नहीं है। इसे वैश्विक सौर ऊर्जा सहयोग और जलवायु से जुड़े प्रयासों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है। यह फैसला साफ संकेत देता है कि ट्रंप प्रशासन ऊर्जा नीति को लेकर किस दिशा में सोच रहा है और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रति उसका रुख कितना सख्त है।
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